''वी. अनुराधा सिंह'' कथक नृत्यांगना
  ABOUT
 
  PERFORMANCES
 
  GALLERY
 
  VIDEOS
 
  MEDIA
 
  KATHAK CENTRE
 
  EVENT
 
  CONTACT
  Ghunghroo Vadan

An extremely powerful rhythmic and highly energetic unique classical musical journey of Bell like no other, very fast tempi in various rhythmic patterns. The mission is to cultivate originality, independence, and innovation in the Indian classical musical performance arena through unique instrumental art. V Anuradha Singh (the artist) explores the beauty and power of bell, one of the world’s most ancient instruments (5000 years old). In which feet movements convey meaning of various classical rhythmic patterns of Bell music.

V. Anuradha Singh is a pioneer in the world of music for introducing percussive art by feet and has been recognized for Ghunghroo / Bell instrumental-unique Indian classical music (an innovative and ancient traditional work in technique, rhythmic understanding and ability to improvise with speedy rhythms).She researched the unique aspects of various rhythmic patterns through rigorous training of twenty years. Ghunghroo playing technique involves extensive use of the toe and heel (apply pressure) in various configurations to create a wide variety of different sounds of bell, reflected in the mnemonic syllables (bol). She holds vast amounts of traditional classical rhythmic patterns knowledge and expertise.

Anuradha has to be very alert and extremely intelligent to grasp rythmic creativity and spontaneity. And she had it all - intelligence, grasping power, sincerity. Anuradha's efforts, hard work and capabilities have all contributed to her mark in the music world.

She daringly and innovatively pioneered the rhythmic lessons in ghunghroo playing and made famous her perceptions on innovation in music through her unique Ghunghroo Vadan style.

 
‘‘वी. अनुराधा सिंह द्वारा विकसित शास्रीय घुंघरू वादन‘‘

शास्त्रीय संगीत के इतिहास में वी. अनुराधा सिंह ने घुंघरू को इंस्ट्रूमेंटल का दर्जा दिला कर विश्व संगीत जगत में क्रांति ला दी । क्रांति की पहली शर्त मौलिकता और दूसरी गुणवत्ता होती है । इन दोनों की तलाश ही, डेढ़ घंटे का यह कार्यक्रम दर्शको को अहसास दिलाता है जो पूर्णरूप से घुंघरू वादन पर आधारित है ।

आपने मंच पर विभिन्न रागों और तालों पर वर्षों पुराने घरानेदार पेशकर, कायदे, रेले, गतें, परने व बोलों के एक-एक बोल को अतिद्रुत लय में घुंघरू द्वारा साधा जो कि असाधारण कार्य था । घुंघरूओं द्वारा तबले के सभी शास्त्रीय घराने जैसे दिल्ली, अजराड़ा, फरूखाबाद, बनारस, लखनउ तथा पंजाब इत्यादि के वर्षो पुराने सबक को साधने में और एक-एक ध्वनि को स्पष्ट कर अति तीव्र गति में करना असाधारण तपस्या है । इस कला हेतु ज्ञान, बुद्धि, शारीरिक क्षमता का एक साथ काम करना ही मूल आधार है ।

आपने गहन प्रशिक्षण द्वारा प्रत्येक घराने के अनूठे पहलुओं पर खोज की है । प्रसिद्ध 5 ताल वाद्य घरानों की शैलियों के सुमेल से विशुद्ध शास्त्रीय घुंघरू वादन के प्रदर्शन हेतु अत्यधिक निपुणता, असीमित धैर्य, बेहतरीन नियंत्रण, स्टैमिना, शारीरिक शक्ति और स्मृति की आवश्यकता होती है । घुंघरू वादन एक दिव्य सुंदरता, संसाधनों की स्पष्टता, अत्यधिक तीव्रता, आश्चर्यजनक विविधता और चमत्कारिक प्रफुल्लता प्रदर्शित करता है । इसकी लयात्मकता, विभिन्न शैलियों और कलाओं का संगम विभिन्न पृष्ठभूमियों से अर्जित विरले संयोजनों के विकास के लिए यह अनूठा वातावरण सृजित करता है । आपने दिल्ली, अजराड़ा, फरूखाबाद, बनारस व लखनउ और पूरब घरानों की तकनीकों का विशिष्ट संयोजन किया है । जिसमें प्रसिद्ध कलाकारों के आसाधारण कार्यो और तालवादकों के कार्यो पर अनुसंधान किया जिससे लय के सभी पहलुओं पर उत्कृष्टता प्राप्त हो सकी और तकनीक, लयात्मक समझ और तात्कालिकता के संबंध में विशुद्ध पारम्परिक कार्यो में गहराई से उतर कर एकल घुंघरू वादन को विकसित किया जो कि तीव्रगति और ताल लयात्मक पद संचालन पर आधारित है जो मन को झंकृत कर देता है ।